नहीं संभलते आँसू मुझसे ,मैंने बहना सीख लिया है ,
तेरा ही तो गम है मितवा ,मैंने पीना सीख लिया है,
मैं क्या पिघला पर्वत पिघले ,आँखों से ये झरने निकले,
तेरी उल्फत का दरिया है ,इसमें तेरे सागर निकले ,
खारी बूँदों को पी -पी कर , मैंने जीना सीख लिया है /
शुक्रवार, 12 अगस्त 2011
गुरुवार, 11 अगस्त 2011
बुधवार, 10 अगस्त 2011
मंगलवार, 9 अगस्त 2011
शनिवार, 6 अगस्त 2011
बुधवार, 3 अगस्त 2011
मंगलवार, 2 अगस्त 2011
सोमवार, 1 अगस्त 2011
तेरी रचना शायद कर दूं ,शब्दों से तो हो न सकेगी,
इस मिट्टी में कितना दम है ,गुंथने से तो हो न सकेगी ,
जब तक तेरी साँसें मेरी ,साँसों में ही घुल जायेंगी,
किस साँचे में मन को रख दूं , दलने से तो हो न सकेगी ,
नदियों के जल में भी अक्सर, झिलमिल तेरी देखी मैंने ,
आँचल जैसी लहराती -सी , धूप - सुनहली देखी मैंने ,
पर्वत के उजले- शिखरों पर , जब भी तुझको महसूस किया ,
तेरे माथे की बिंदिया पर , सुबह- नवेली देखी मैंने,
मेरे पास बचे हैं तेरी यादों के वो मौसम सारे ,
एक - एक कर गुजर रहे हैं पलकों में वो घुले नज़ारे,
तू आती है , तू जाती है ,उत्सव जैसे आते -जाते ,
किसे पता है तुझसे होते कितने मेरे मदिर इशारे ,
इस मिट्टी में कितना दम है ,गुंथने से तो हो न सकेगी ,
जब तक तेरी साँसें मेरी ,साँसों में ही घुल जायेंगी,
किस साँचे में मन को रख दूं , दलने से तो हो न सकेगी ,
नदियों के जल में भी अक्सर, झिलमिल तेरी देखी मैंने ,
आँचल जैसी लहराती -सी , धूप - सुनहली देखी मैंने ,
पर्वत के उजले- शिखरों पर , जब भी तुझको महसूस किया ,
तेरे माथे की बिंदिया पर , सुबह- नवेली देखी मैंने,
मेरे पास बचे हैं तेरी यादों के वो मौसम सारे ,
एक - एक कर गुजर रहे हैं पलकों में वो घुले नज़ारे,
तू आती है , तू जाती है ,उत्सव जैसे आते -जाते ,
किसे पता है तुझसे होते कितने मेरे मदिर इशारे ,
रविवार, 31 जुलाई 2011
किताब कोई दर्द की खुल गई है आहिस्ता ,
कुछ सफों पर जम गई है बे जुबानी आहिस्ता ,
अश्क से पूछा किसी ने क्यों टपकता है यहाँ,
लिख रहा क्यों सूखकर तू ये कहानी आहिस्ता,
हस्तियाँ मिटने लगीं हैं देख ले तू आहिस्ता ,
फूल सब मुरझा रहे हैं देख ले तू आहिस्ता ,
छोड़ दे , दो शब्द अपने हो सके तो प्यार के,
पास तेरे क्या बचा है देख ले तू आहिस्ता ,
सिर्फ तेरे पास तेरी जिद खड़ी है आहिस्ता ,
बोझ तेरा कम नहीं है सह रहा तू आहिस्ता ,
बाँट ले तू मुस्कुराकर जिन्दगी को आहिस्ता,
लोग तेरी हमदिली पर मिट गये हैं आहिस्ता,
कुछ सफों पर जम गई है बे जुबानी आहिस्ता ,
अश्क से पूछा किसी ने क्यों टपकता है यहाँ,
लिख रहा क्यों सूखकर तू ये कहानी आहिस्ता,
हस्तियाँ मिटने लगीं हैं देख ले तू आहिस्ता ,
फूल सब मुरझा रहे हैं देख ले तू आहिस्ता ,
छोड़ दे , दो शब्द अपने हो सके तो प्यार के,
पास तेरे क्या बचा है देख ले तू आहिस्ता ,
सिर्फ तेरे पास तेरी जिद खड़ी है आहिस्ता ,
बोझ तेरा कम नहीं है सह रहा तू आहिस्ता ,
बाँट ले तू मुस्कुराकर जिन्दगी को आहिस्ता,
लोग तेरी हमदिली पर मिट गये हैं आहिस्ता,
तेरी रचना शायद कर दूं ,शब्दों से तो हो न सकेगी,
इस मिट्टी में कितना दम है ,गुंथने से तो हो न सकेगी ,
जब तक तेरी साँसें मेरी ,साँसों में ही घुल जायेंगी,
किस साँचे में मन को रख दूं , दलने से तो हो न सकेगी ,
नदियों के जल में भी अक्सर, झिलमिल तेरी देखी मैंने ,
आँचल जैसी लहराती -सी , धूप - सुनहली देखी मैंने ,
पर्वत के उजले- शिखरों पर , जब भी तुझको महसूस किया ,
तेरे माथे की बिंदिया पर , सुबह- नवेली देखी मैंने,
मेरे पास बचे हैं तेरी यादों के वो मौसम सारे ,
एक - एक कर गुजर रहे हैं पलकों में वो घुले नज़ारे,
तू आती है , तू जाती है ,उत्सव जैसे आते -जाते ,
किसे पता है तुझसे होते कितने मेरे इशारे
इस मिट्टी में कितना दम है ,गुंथने से तो हो न सकेगी ,
जब तक तेरी साँसें मेरी ,साँसों में ही घुल जायेंगी,
किस साँचे में मन को रख दूं , दलने से तो हो न सकेगी ,
नदियों के जल में भी अक्सर, झिलमिल तेरी देखी मैंने ,
आँचल जैसी लहराती -सी , धूप - सुनहली देखी मैंने ,
पर्वत के उजले- शिखरों पर , जब भी तुझको महसूस किया ,
तेरे माथे की बिंदिया पर , सुबह- नवेली देखी मैंने,
मेरे पास बचे हैं तेरी यादों के वो मौसम सारे ,
एक - एक कर गुजर रहे हैं पलकों में वो घुले नज़ारे,
तू आती है , तू जाती है ,उत्सव जैसे आते -जाते ,
किसे पता है तुझसे होते कितने मेरे इशारे
शनिवार, 30 जुलाई 2011
तेरी रचना शायद कर दूं ,शब्दों से तो हो न सकेगी,
इस मिट्टी में कितना दम है ,गुंथने से तो हो न सकेगी ,
जब तक तेरी साँसें मेरी ,साँसों में ही घुल जायेंगी,
किस साँचे में मन को रख दूं , दलने से तो हो न सकेगी ,
नदियों के जल में भी अक्सर, झिलमिल तेरी देखी मैंने ,
आँचल जैसी लहराती -सी , धूप - सुनहली देखी मैंने ,
पर्वत के उजले- शिखरों पर , जब भी तुझको महसूस किया ,
तेरे माथे की बिंदिया पर , सुबह- नवेली देखी मैंने,
इस मिट्टी में कितना दम है ,गुंथने से तो हो न सकेगी ,
जब तक तेरी साँसें मेरी ,साँसों में ही घुल जायेंगी,
किस साँचे में मन को रख दूं , दलने से तो हो न सकेगी ,
नदियों के जल में भी अक्सर, झिलमिल तेरी देखी मैंने ,
आँचल जैसी लहराती -सी , धूप - सुनहली देखी मैंने ,
पर्वत के उजले- शिखरों पर , जब भी तुझको महसूस किया ,
तेरे माथे की बिंदिया पर , सुबह- नवेली देखी मैंने,
शुक्रवार, 29 जुलाई 2011
रेशा -रेशा इस जीवन का,
तुमसे निर्मित होकर आया ,
कोई किरन बची ना ऐसी ,
जिसने तुमको नहीं सजाया /
फूलों की मुस्कानों में तुम ,
अपनी खुशबू भर देती हो,
कोई झोंका बचा ना ऐसा ,
निकट न तुमको जो ले आया /
जितने मौसम बने यहाँ पर,
अंगड़ाई थी उनमें ऐसी ,
जैसे तुममें रची-बसी थी ,
हरसिंगारों जैसी काया /
छुई -मुई के पत्ते जैसे ,
सहसा स्पंदित होते हैं,
पलकों पर इंगित होती थी ,
सृष्टि की पूरी प्रतिछाया /
....देवेन्द्र चौधरी ''तुषार''
,12-बी ,सेक्टर -3 ,
गौतम पल्ली मार्ग ,वैशाली, गाजियाबाद -201010
तुमसे निर्मित होकर आया ,
कोई किरन बची ना ऐसी ,
जिसने तुमको नहीं सजाया /
फूलों की मुस्कानों में तुम ,
अपनी खुशबू भर देती हो,
कोई झोंका बचा ना ऐसा ,
निकट न तुमको जो ले आया /
जितने मौसम बने यहाँ पर,
अंगड़ाई थी उनमें ऐसी ,
जैसे तुममें रची-बसी थी ,
हरसिंगारों जैसी काया /
छुई -मुई के पत्ते जैसे ,
सहसा स्पंदित होते हैं,
पलकों पर इंगित होती थी ,
सृष्टि की पूरी प्रतिछाया /
....देवेन्द्र चौधरी ''तुषार''
,12-बी ,सेक्टर -3 ,
गौतम पल्ली मार्ग ,वैशाली, गाजियाबाद -201010
शुक्रवार, २९ जुलाई २०११
रेशा -रेशा इस जीवन का,
तुमसे निर्मित होकर आया ,
कोई किरन बची ना ऐसी ,
जिसने तुमको नहीं सजाया,
फूलों की मुस्कानों में तुम ,
अपनी खुशबू भर देती हो,
कोई झोंका बचा ना ऐसा ,
लिपट के तुमसे जो ना आया,
जितने मौसम बने यहाँ पर,
अंगड़ाई थी उनमें ऐसी ,
जैसे तुमने भर दी उनमें ,
हरसिंगारों जैसी काया,
छुई -मुई के पत्ते जैसे ,
सहसा स्पंदित होते हैं,
पलकों पर इंगित होती थी ,
सृष्टि की पूरी परिभाषा,
रेशा -रेशा इस जीवन का,
तुमसे निर्मित होकर आया ,
कोई किरन बची ना ऐसी ,
जिसने तुमको नहीं सजाया,
फूलों की मुस्कानों में तुम ,
अपनी खुशबू भर देती हो,
कोई झोंका बचा ना ऐसा ,
लिपट के तुमसे जो ना आया,
जितने मौसम बने यहाँ पर,
अंगड़ाई थी उनमें ऐसी ,
जैसे तुमने भर दी उनमें ,
हरसिंगारों जैसी काया,
छुई -मुई के पत्ते जैसे ,
सहसा स्पंदित होते हैं,
पलकों पर इंगित होती थी ,
सृष्टि की पूरी परिभाषा,
रेशा -रेशा इस जीवन का,
तुमसे निर्मित होकर आया ,
कोई किरन बची ना ऐसी ,
जिसने तुमको नहीं सजाया,
फूलों की मुस्कानों में तुम ,
अपनी खुशबू भर देती हो,
कोई झोंका बचा ना ऐसा ,
लिपट के तुमसे जो ना आया,
जितने मौसम बने यहाँ पर,
अंगड़ाई थी उनमें ऐसी ,
जैसे तुमने भर दी उनमें ,
हरसिंगारों जैसी काया,
छुई -मुई के पत्तों पर जैसे ,
स्पंदन सहसा हो जाते ,
पलकों पर नाचा करती थी ,
सृष्टि की पूरी परिभाषा,
तुमसे निर्मित होकर आया ,
कोई किरन बची ना ऐसी ,
जिसने तुमको नहीं सजाया,
फूलों की मुस्कानों में तुम ,
अपनी खुशबू भर देती हो,
कोई झोंका बचा ना ऐसा ,
लिपट के तुमसे जो ना आया,
जितने मौसम बने यहाँ पर,
अंगड़ाई थी उनमें ऐसी ,
जैसे तुमने भर दी उनमें ,
हरसिंगारों जैसी काया,
छुई -मुई के पत्तों पर जैसे ,
स्पंदन सहसा हो जाते ,
पलकों पर नाचा करती थी ,
सृष्टि की पूरी परिभाषा,
गुरुवार, 28 जुलाई 2011
बुधवार, 27 जुलाई 2011
जो तुम्हें मैं दूंद लाऊँ ,कुछ मुझे ऐसी खबर हो,
जो पता तेरा लगा दे ,जिन्दगी की वो खबर हो ,
चाँद -सूरज चल रहे हैं ,इस तरफ से उस तरफ तक ,
रोज ही वो आ रहे हैं, उस तरफ से इस तरफ तक,
क्यों नहीं मुझको बताते ,रोज इतना क्यों सताते ,
जिस तरह उनको तुम्हारी छेड़खानी की खबर हो,
कौन जीता है यहाँ पर , कौन मिटता है यहाँ पर ,
लुक छिपी का खेल यह क्यों , रोज चलता है यहाँ पर ,
किस महोब्बत से मिले थे ,किस महोब्बत से जिए थे ,
क्या पता इन बादलों को ,उस कहानी की खबर हो,
आज तुमने फिर मुझे कुछ प्यार से आकर सुलाया,
आँख से आँखें मिलाकर ,विश्व का दर्पण दिखाया,
दूरियों का सोचना क्या ,सिर्फ धोखा है यहाँ सब,
अंश तेरा बन गई हूँ उस निशानी की खबर हो,
जो पता तेरा लगा दे ,जिन्दगी की वो खबर हो ,
चाँद -सूरज चल रहे हैं ,इस तरफ से उस तरफ तक ,
रोज ही वो आ रहे हैं, उस तरफ से इस तरफ तक,
क्यों नहीं मुझको बताते ,रोज इतना क्यों सताते ,
जिस तरह उनको तुम्हारी छेड़खानी की खबर हो,
कौन जीता है यहाँ पर , कौन मिटता है यहाँ पर ,
लुक छिपी का खेल यह क्यों , रोज चलता है यहाँ पर ,
किस महोब्बत से मिले थे ,किस महोब्बत से जिए थे ,
क्या पता इन बादलों को ,उस कहानी की खबर हो,
आज तुमने फिर मुझे कुछ प्यार से आकर सुलाया,
आँख से आँखें मिलाकर ,विश्व का दर्पण दिखाया,
दूरियों का सोचना क्या ,सिर्फ धोखा है यहाँ सब,
अंश तेरा बन गई हूँ उस निशानी की खबर हो,
मंगलवार, 26 जुलाई 2011
जो तुम्हें मैं दूंद लाऊँ ,कुछ मुझे ऐसी खबर हो,
जो पता तेरा लगा दे ,जिन्दगी की वो खबर हो ,
चाँद -सूरज चल रहे हैं ,इस तरफ से उस तरफ तक ,
रोज ही वो आ रहे हैं, उस तरफ से इस तरफ तक,
क्यों नहीं मुझको बताते ,रोज इतना क्यों सताते ,
जिस तरह उनको तुम्हारी छेड़खानी की खबर हो,
कौन जीता है यहाँ पर , कौन मिटता है यहाँ पर ,
लुक छिपी का खेल यह क्यों , रोज चलता है यहाँ पर ,
किस महोब्बत से मिले थे ,किस महोब्बत से जिए थे ,
क्या पता इन बादलों को ,उस कहानी की खबर हो,
,
जो पता तेरा लगा दे ,जिन्दगी की वो खबर हो ,
चाँद -सूरज चल रहे हैं ,इस तरफ से उस तरफ तक ,
रोज ही वो आ रहे हैं, उस तरफ से इस तरफ तक,
क्यों नहीं मुझको बताते ,रोज इतना क्यों सताते ,
जिस तरह उनको तुम्हारी छेड़खानी की खबर हो,
कौन जीता है यहाँ पर , कौन मिटता है यहाँ पर ,
लुक छिपी का खेल यह क्यों , रोज चलता है यहाँ पर ,
किस महोब्बत से मिले थे ,किस महोब्बत से जिए थे ,
क्या पता इन बादलों को ,उस कहानी की खबर हो,
,
सोमवार, 25 जुलाई 2011
ख़ुशी छलकी जो आँखों से ,उसी के अश्रु झरते हैं,
अभी तक ज्वार -भाटे वो ,समंदर में उमड़ते हैं ,
अभी तक उन निगाहों में कहीं डूबा हुआ है दिल ,
अगर कुछ ख्वाव जिन्दा हैं, उन्हीं से बस गुजरते हैं,
सुबह जो भीग कर आई ,न सूखीं शाम तक पलकें,
घटाओं में घिरीं थीं जो ,तुमारी रेशमीं अलकें,
तुम्हें देखा , बहुत देखा ,सुबह से शाम तक देखा,
तुम्हारे ही उजालों में ,हमारे दिन निकलते हैं,
अभी तक ज्वार -भाटे वो ,समंदर में उमड़ते हैं ,
अभी तक उन निगाहों में कहीं डूबा हुआ है दिल ,
अगर कुछ ख्वाव जिन्दा हैं, उन्हीं से बस गुजरते हैं,
सुबह जो भीग कर आई ,न सूखीं शाम तक पलकें,
घटाओं में घिरीं थीं जो ,तुमारी रेशमीं अलकें,
तुम्हें देखा , बहुत देखा ,सुबह से शाम तक देखा,
तुम्हारे ही उजालों में ,हमारे दिन निकलते हैं,
रविवार, 24 जुलाई 2011
शनिवार, 23 जुलाई 2011
शुक्रवार, 22 जुलाई 2011
गुरुवार, 21 जुलाई 2011
शाम का सूरज दला है, बृक्ष गुमसुम से खड़े हैं,
पक्षियों के दल थके- से लौट कर वापस चले हैं ,
एक पूरा दिन गुजर कर , रह गया है इस तरह फिर,
जिन्दगी के स्वप्न जैसे शाख पर वापस चले हैं,
भोर के पंछी उड़े थे , भोर की पहली किरन तक,
साँझ के पंछी उड़े हैं , शाम की अंतिम किरन तक,
पंछियों की ये उड़ानें ,क्या संदेशा दे रहीं हैं,
जिन्दगी अभियान है इक ,जिन्दगी के अवतरण तक ,
एक पंछी जो कभी भी चैन से सोता नहीं है,
वो जहाँ की सब हदों को तोड़ देना चाहता है,
वो तुम्हारे वास्ते ही उड़ रहा है अनवरत -सा ,
वो सितारे सब गगन के तोड़ लेना चाहता है ,
पक्षियों के दल थके- से लौट कर वापस चले हैं ,
एक पूरा दिन गुजर कर , रह गया है इस तरह फिर,
जिन्दगी के स्वप्न जैसे शाख पर वापस चले हैं,
भोर के पंछी उड़े थे , भोर की पहली किरन तक,
साँझ के पंछी उड़े हैं , शाम की अंतिम किरन तक,
पंछियों की ये उड़ानें ,क्या संदेशा दे रहीं हैं,
जिन्दगी अभियान है इक ,जिन्दगी के अवतरण तक ,
एक पंछी जो कभी भी चैन से सोता नहीं है,
वो जहाँ की सब हदों को तोड़ देना चाहता है,
वो तुम्हारे वास्ते ही उड़ रहा है अनवरत -सा ,
वो सितारे सब गगन के तोड़ लेना चाहता है ,
बुधवार, 20 जुलाई 2011
मंगलवार, 19 जुलाई 2011
गुरुवार, 14 जुलाई 2011
शनिवार, 9 जुलाई 2011
कुछ नहाई - सी प्रकृति है,कुछ नशीली -सी हवायें,
पंछियों की चहचहाहट ,भोर की हैं अर्चनायें,
सब तुम्हारी याद लेकर ,आ रहीं हैं, जा रहीं हैं,
कुछ तुम्हारा रूप लेकर ,गद रहीं हैं कल्पनायें ,
यह गुलाबी डालियाँ कुछ,कह रहीं हैं, सुन रहीं हैं,
कुछ मदिर -सी वासनायें ,तितलियों -सी उड़ रहीं हैं,
कुछ सुकोमल झील पर , बिखरी हुई है देह-राशि ,
पारदर्शी- भंगिमायें लोचनों में तिर रहीं हैं,
कुछ सुहानी धूप लेकर ,खिल रहीं हैं ज्योत्सनायें,
तुम जहाँ हो, मैं वहाँ हूँ,कौन समझेगा यहाँ पर,
बेबजह ही रो रहा हूँ, कौन समझेगा यहाँ पर,
द्र्श्य बिम्बित हो रहे हैं , सब तुम्हें साकार करने,
प्यार कितना है असीमित ,कौन समझेगा यहाँ पर,
कुछ अलौकिक बन्धनों -सी हैं तुम्हारी सुष्मितायें /
पंछियों की चहचहाहट ,भोर की हैं अर्चनायें,
सब तुम्हारी याद लेकर ,आ रहीं हैं, जा रहीं हैं,
कुछ तुम्हारा रूप लेकर ,गद रहीं हैं कल्पनायें ,
यह गुलाबी डालियाँ कुछ,कह रहीं हैं, सुन रहीं हैं,
कुछ मदिर -सी वासनायें ,तितलियों -सी उड़ रहीं हैं,
कुछ सुकोमल झील पर , बिखरी हुई है देह-राशि ,
पारदर्शी- भंगिमायें लोचनों में तिर रहीं हैं,
कुछ सुहानी धूप लेकर ,खिल रहीं हैं ज्योत्सनायें,
तुम जहाँ हो, मैं वहाँ हूँ,कौन समझेगा यहाँ पर,
बेबजह ही रो रहा हूँ, कौन समझेगा यहाँ पर,
द्र्श्य बिम्बित हो रहे हैं , सब तुम्हें साकार करने,
प्यार कितना है असीमित ,कौन समझेगा यहाँ पर,
कुछ अलौकिक बन्धनों -सी हैं तुम्हारी सुष्मितायें /
गुरुवार, 7 जुलाई 2011
बुधवार, 6 जुलाई 2011
मंगलवार, 5 जुलाई 2011
सोमवार, 4 जुलाई 2011
गुरुवार, 30 जून 2011
बुधवार, 29 जून 2011
रविवार, 26 जून 2011
शनिवार, 25 जून 2011
खुशबुओं में तरबतर हो, ये हवायें बह रहीं हैं,
तुम यहीं हो ,पास में हो,हाल हमसे कह रहीं हैं/
दर्द ने चिठ्ठी लिखी है, क्या पता तुमने पदी हो,
धड़कनों की बेकरारी ,क्या पता तुमने सुनी हो,
किसतरह हम जी रहे हैं , किसतरह हम चल रहे हैं,
साँस में है जो प्रतीक्षा ,क्या पता तुमने बुनी हो,
हौसला तू मत डिगाना ,ये दिशाएँ कह रहीं हैं/
तुम यहीं हो ,पास में हो,हाल हमसे कह रहीं हैं/
दर्द ने चिठ्ठी लिखी है, क्या पता तुमने पदी हो,
धड़कनों की बेकरारी ,क्या पता तुमने सुनी हो,
किसतरह हम जी रहे हैं , किसतरह हम चल रहे हैं,
साँस में है जो प्रतीक्षा ,क्या पता तुमने बुनी हो,
हौसला तू मत डिगाना ,ये दिशाएँ कह रहीं हैं/
सोमवार, 20 जून 2011
हम तुम्ही को पा रहे हैं, हम तुम्हीं को खो रहे हैं ,
रात -दिन ये बेकरारी , बस तुम्हारे हो रहे हैं,
यज्ञ कोई चल रहा है इस जगत में ,उस जगत का ,
है नहीं कुछ भी हमारा,पर इशारे हो रहे हैं,
मन-विहग ये,उड़ रहा है जिस तरह से नील नभ में ,
दूंद ही लेगा तुम्हें ये ,बस हमें इतना पता है,
रोशनी जो आ रही है , झिलमिलाकर छा रही है,
चूम लेगा तन -बदन को ,बस हमें इतना पता है,
शिल्प , कुदरत के हजारों, बस तुम्हारे हो रहे हैं,
हों न शायद ,इस जहाँ में,दर्द के चर्चे हमारे,
किन्तु आयेंगे उतरकर ,प्यार के मौसम हमारे,
लोग छुपकर सुन रहे हैं बात सारी धड़कनों की,
कह रहे हो तुम अभी तक , धड़कनों से जो हमारे,
हर कशिस से, हर कशिस तक, हम तुम्हारे हो रहे हैं/
रात -दिन ये बेकरारी , बस तुम्हारे हो रहे हैं,
यज्ञ कोई चल रहा है इस जगत में ,उस जगत का ,
है नहीं कुछ भी हमारा,पर इशारे हो रहे हैं,
मन-विहग ये,उड़ रहा है जिस तरह से नील नभ में ,
दूंद ही लेगा तुम्हें ये ,बस हमें इतना पता है,
रोशनी जो आ रही है , झिलमिलाकर छा रही है,
चूम लेगा तन -बदन को ,बस हमें इतना पता है,
शिल्प , कुदरत के हजारों, बस तुम्हारे हो रहे हैं,
हों न शायद ,इस जहाँ में,दर्द के चर्चे हमारे,
किन्तु आयेंगे उतरकर ,प्यार के मौसम हमारे,
लोग छुपकर सुन रहे हैं बात सारी धड़कनों की,
कह रहे हो तुम अभी तक , धड़कनों से जो हमारे,
हर कशिस से, हर कशिस तक, हम तुम्हारे हो रहे हैं/
गुरुवार, 16 जून 2011
अंकुरित हो, पल्लवित हो, स्रष्टि रचना हो रही है,
रजकणों में आज कैसी ,हरहराहत हो रही है ,
कल खिलेंगे फूल इसमें ,यह छिपा सन्देश है,
धमनियों में एक सुरभित ,सनसनाहट हो रही है /
इस प्रकृति में चेतना है, प्रार्थना है,कल्पना है,
भोर का सूरज कहीं तो, पूर्णिमा का चंद्रमा है,
झील,झरने,मेघ ,सागर सब इसी में बह रहे हैं,
प्रेम का दरिया कहीं तो, प्रेयसी की भंगिमा है /
प्रस्फुटित -सी, उदघटित-सी,रूप- रचना हो रही है/
हो सके तो आज इसकी अर्चना के गीत गाओ,
आज इसके कुन्तलों में ,मधु -ऋतू अपनी मनाओ.
तन डुबाओ,मन डुबाओ,इक नई दुल्हन सजाओ,
इक नया श्रृंगार देकर ,बस इसे तुम जीत लाओ,
विस्फ़रित-सी,रस -द्रवित -सी, छन्द -रचना हो रही है/
रजकणों में आज कैसी ,हरहराहत हो रही है ,
कल खिलेंगे फूल इसमें ,यह छिपा सन्देश है,
धमनियों में एक सुरभित ,सनसनाहट हो रही है /
इस प्रकृति में चेतना है, प्रार्थना है,कल्पना है,
भोर का सूरज कहीं तो, पूर्णिमा का चंद्रमा है,
झील,झरने,मेघ ,सागर सब इसी में बह रहे हैं,
प्रेम का दरिया कहीं तो, प्रेयसी की भंगिमा है /
प्रस्फुटित -सी, उदघटित-सी,रूप- रचना हो रही है/
हो सके तो आज इसकी अर्चना के गीत गाओ,
आज इसके कुन्तलों में ,मधु -ऋतू अपनी मनाओ.
तन डुबाओ,मन डुबाओ,इक नई दुल्हन सजाओ,
इक नया श्रृंगार देकर ,बस इसे तुम जीत लाओ,
विस्फ़रित-सी,रस -द्रवित -सी, छन्द -रचना हो रही है/
रविवार, 12 जून 2011
हर निशानी अब खतम है, वो कहानी अब खतम है ,
रोज का मातम नहीं अब ,जिंदगानी ही खतम है,
लो तुम्हें आबाज देकर आखिरी में जा रहा हूँ ,
जो बसाई थी कभी वो राजधानी ही खतम है,
लौट आना ,किसलिए अब ,बुलबुलों से पूछ लेना ,
चाँदनी में झिलमिलाती चिलमनों से पूछ लेना ,
किस कदर होने लगीं थीं सनसनाहट तन -बदन में ,
हो सके तो इन गरजती, बिजलियों से पूछ लेना ,
रोज का मातम नहीं अब ,जिंदगानी ही खतम है,
लो तुम्हें आबाज देकर आखिरी में जा रहा हूँ ,
जो बसाई थी कभी वो राजधानी ही खतम है,
लौट आना ,किसलिए अब ,बुलबुलों से पूछ लेना ,
चाँदनी में झिलमिलाती चिलमनों से पूछ लेना ,
किस कदर होने लगीं थीं सनसनाहट तन -बदन में ,
हो सके तो इन गरजती, बिजलियों से पूछ लेना ,
शनिवार, 11 जून 2011
शुक्रवार, 10 जून 2011
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