शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

नहीं संभलते आँसू मुझसे ,मैंने बहना सीख लिया है ,
तेरा ही तो गम है मितवा ,मैंने पीना सीख लिया है,
मैं क्या पिघला पर्वत पिघले ,आँखों से ये झरने निकले,
तेरी उल्फत का दरिया है ,इसमें तेरे सागर निकले ,
खारी बूँदों को पी -पी कर , मैंने जीना सीख लिया है /

गुरुवार, 11 अगस्त 2011

कुछ पत्तों के पीछे अक्सर, चाँद छिपा मैंने देखा है,
मेरी खिड़की से जब गुजरा, नजरों में उसको देखा है ,
मुग्ध लगा था वो कितना अपनी मदहोशी के आलम में ,
अधरों की कितनी किरचों ने छू छू कर उसको देखा है ,
कुछ पत्तों के पीछे अक्सर, चाँद छिपा मैंने देखा है,
मेरी खिड़की से जब गुजरा, नजरों में उसको देखा है ,

बुधवार, 10 अगस्त 2011

अलसाते फूलों का खिलना ,पलकों में बंद पड़ा है ,
कैसे खोलूँ यह आँखें ,उनमें क्या - क्या बंद पड़ा है,
रेशम -सी काया है कोई ,सिहरन बनकर छाई है ,
जाने कितने उन्मादों की, तितली उड़कर आई है ,
अवचेतन में जैसे इठलाता मधुवन बंद पड़ा है ,

मंगलवार, 9 अगस्त 2011

अलसाते फूलों का खिलना ,पलकों में बंद पड़ा है ,
कैसे खोलूँ यह आँखें ,उनमें क्या - क्या बंद पड़ा है,
रेशम -सी काया है कोई ,सिहरन बनकर छाई है ,
जाने कितने उन्मादों की, तितली उड़कर आई है ,

शनिवार, 6 अगस्त 2011

एक पंखरी फूल की , होठ पर ऐसी लगी ,
छुट नहीं पायी कभी , होठ खिलते रह गए ,
अश्रु उसको सींचकर ओस जैसे गिर गए,
ख्वाब जो झिलमिल हुए , रश्मियों से भर गए ,

बुधवार, 3 अगस्त 2011


बुधवार, 3 अगस्त 2011
मैं भला सोया कहाँ था , ख्वाब पलकों में भरे थे ,
जिन्दगी के कुछ रूहानी -आब पलकों में भरे थे,
जो ख्यालों में खिले ,महताब पलकों में भरे थे ,
था नहीं  जिनका उगम  ,  जांबाज  पलकों में भरे थे , 

मंगलवार, 2 अगस्त 2011

मैं भला सोया कहाँ था , ख्वाब पलकों में भरे थे ,
जिन्दगी के कुछ रूहानी -आब पलकों में भरे थे,
जो ख्यालों में बसे ,महताब पलकों में बसे थे ,
था न उत्तर जिस नबीं का जबाब पलकों में भरे थे
दिन भर धूप बिखेरी , दुनिया को बांटी है ,
मैंने तो दोपहरी , ऐसे ही काटी है ,

सोमवार, 1 अगस्त 2011

तेरी रचना शायद कर दूं ,शब्दों से तो हो न सकेगी,
इस मिट्टी में कितना दम है ,गुंथने से तो हो न सकेगी ,
जब तक तेरी साँसें मेरी ,साँसों में ही घुल जायेंगी,
किस साँचे में मन को रख दूं , दलने से तो हो न सकेगी ,
नदियों के जल में भी अक्सर, झिलमिल तेरी देखी मैंने ,
आँचल जैसी लहराती -सी , धूप - सुनहली देखी मैंने ,
पर्वत के उजले- शिखरों पर , जब भी तुझको महसूस किया ,
तेरे माथे की बिंदिया पर , सुबह- नवेली देखी मैंने,
मेरे पास बचे हैं तेरी यादों के वो मौसम सारे ,
एक - एक कर गुजर रहे हैं पलकों में वो घुले नज़ारे,
तू आती है , तू जाती है ,उत्सव जैसे आते -जाते ,
किसे पता है तुझसे होते कितने मेरे मदिर इशारे ,
रो रहा हूँ , मुस्कुराकर , क्या हुआ है आज मुझको ,
ओस- भीगे फूल देखे , क्या हुआ है आज मुझको.,
आज तेरी याद में ही ,घुल गया हूँ इस कदर मैं ,
तन-बदन में तुम खिली हो , क्या हुआ आज मुझको,

रविवार, 31 जुलाई 2011

किताब कोई दर्द की खुल गई है आहिस्ता ,
कुछ सफों पर जम गई है बे जुबानी आहिस्ता ,
अश्क से पूछा किसी ने क्यों टपकता है यहाँ,
लिख रहा क्यों सूखकर तू ये कहानी आहिस्ता,
हस्तियाँ मिटने लगीं हैं देख ले तू आहिस्ता ,
फूल सब मुरझा रहे हैं देख ले तू आहिस्ता ,
छोड़ दे , दो शब्द अपने हो सके तो प्यार के,
पास तेरे क्या बचा है देख ले तू आहिस्ता ,
सिर्फ तेरे पास तेरी जिद खड़ी है आहिस्ता ,
बोझ तेरा कम नहीं है सह रहा तू आहिस्ता ,
बाँट ले तू मुस्कुराकर जिन्दगी को आहिस्ता,
लोग तेरी हमदिली पर मिट गये हैं आहिस्ता,
तेरी रचना शायद कर दूं ,शब्दों से तो हो न सकेगी,
इस मिट्टी में कितना दम है ,गुंथने से तो हो न सकेगी ,
जब तक तेरी साँसें मेरी ,साँसों में ही घुल जायेंगी,
किस साँचे में मन को रख दूं , दलने से तो हो न सकेगी ,
नदियों के जल में भी अक्सर, झिलमिल तेरी देखी मैंने ,
आँचल जैसी लहराती -सी , धूप - सुनहली देखी मैंने ,
पर्वत के उजले- शिखरों पर , जब भी तुझको महसूस किया ,
तेरे माथे की बिंदिया पर , सुबह- नवेली देखी मैंने,
मेरे पास बचे हैं तेरी यादों के वो मौसम सारे ,
एक - एक कर गुजर रहे हैं पलकों में वो घुले नज़ारे,
तू आती है , तू जाती है ,उत्सव जैसे आते -जाते ,
किसे पता है तुझसे होते कितने मेरे इशारे
हस्तियाँ मिटने लगीं हैं देख ले तू आहिस्ता ,
फूल सब मुरझा रहे हैं देख ले तू आहिस्ता ,
छोड़ दे , दो शब्द अपने हो सके तो प्यार के,
पास तेरे क्या बचा है देख ले तू आहिस्ता ,

शनिवार, 30 जुलाई 2011

तेरी रचना शायद कर दूं ,शब्दों से तो हो न सकेगी,
इस मिट्टी में कितना दम है ,गुंथने से तो हो न सकेगी ,
जब तक तेरी साँसें मेरी ,साँसों में ही घुल जायेंगी,
किस साँचे में मन को रख दूं , दलने से तो हो न सकेगी ,
नदियों के जल में भी अक्सर, झिलमिल तेरी देखी मैंने ,
आँचल जैसी लहराती -सी , धूप - सुनहली देखी मैंने ,
पर्वत के उजले- शिखरों पर , जब भी तुझको महसूस किया ,
तेरे माथे की बिंदिया पर , सुबह- नवेली देखी मैंने,
तेरी रचना शायद कर दूं ,शब्दों से तो हो न सकेगी,
इस मिट्टी में कितना दम है ,गुंथने से तो हो न सकेगी ,
जब तक तेरी साँसें मेरी ,साँसों में ही घुल जायेंगी,
किस साँचे में मन को रख दूं , दलने से तो हो न सकेगी ,
नदियों के जल में भी अक्सर, झिलमिल देखी तेरी मैंने ,
आँचल जैसी लहराती सी , देखी तेरी मैंने ,
तेरी रचना शायद कर दूं ,शब्दों से तो हो न सकेगी,
इस मिट्टी में कितना दम है ,गुंथने से तो हो न सकेगी ,
जब तक तेरी साँसें मेरी ,साँसों में ही घुल जायेंगी,
किस साँचे में मन को रख दूं , दलने से तो हो न सकेगी ,

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

रेशा -रेशा इस जीवन का,

तुमसे निर्मित होकर आया ,

कोई किरन बची ना ऐसी ,

जिसने तुमको नहीं सजाया /

फूलों की मुस्कानों में तुम ,

अपनी खुशबू भर देती हो,

कोई झोंका बचा ना ऐसा ,

निकट न तुमको जो ले आया /

जितने मौसम बने यहाँ पर,

अंगड़ाई थी उनमें ऐसी ,

जैसे तुममें रची-बसी थी ,

हरसिंगारों जैसी काया /

छुई -मुई के पत्ते जैसे ,

सहसा स्पंदित होते हैं,

पलकों पर इंगित होती थी ,

सृष्टि की पूरी प्रतिछाया /

....देवेन्द्र चौधरी ''तुषार''

,12-बी ,सेक्टर -3 ,

गौतम पल्ली मार्ग ,वैशाली, गाजियाबाद -201010
शुक्रवार, २९ जुलाई २०११

रेशा -रेशा इस जीवन का,

तुमसे निर्मित होकर आया ,

कोई किरन बची ना ऐसी ,

जिसने तुमको नहीं सजाया,

फूलों की मुस्कानों में तुम ,

अपनी खुशबू भर देती हो,

कोई झोंका बचा ना ऐसा ,

लिपट के तुमसे जो ना आया,

जितने मौसम बने यहाँ पर,

अंगड़ाई थी उनमें ऐसी ,

जैसे तुमने भर दी उनमें ,

हरसिंगारों जैसी काया,

छुई -मुई के पत्ते जैसे ,

सहसा स्पंदित होते हैं,

पलकों पर इंगित होती थी ,

सृष्टि की पूरी परिभाषा,
रेशा -रेशा इस जीवन का,
तुमसे निर्मित होकर आया ,
कोई किरन बची ना ऐसी ,
जिसने तुमको नहीं सजाया,
फूलों की मुस्कानों में तुम ,
अपनी खुशबू भर देती हो,
कोई झोंका बचा ना ऐसा ,
लिपट के तुमसे जो ना आया,
जितने मौसम बने यहाँ पर,
अंगड़ाई थी उनमें ऐसी ,
जैसे तुमने भर दी उनमें ,
हरसिंगारों जैसी काया,
छुई -मुई के पत्तों पर जैसे ,
स्पंदन सहसा हो जाते ,
पलकों पर नाचा करती थी ,
सृष्टि की पूरी परिभाषा,

गुरुवार, 28 जुलाई 2011

रेशा -रेशा इस जीवन का,
तुमसे निर्मित होकर आया ,
कोई किरन बची ना ऐसी ,
जिसने तुमको नहीं सजाया,
फूलों की मुस्कानों में तुम ,
अपनी खुशबू भर देती हो,
कोई झोंका बचा ना ऐसा ,
लिपट के तुमसे जो ना आया,
जितने मौसम बने यहाँ पर,
अंगड़ाई थी उनमें ऐसी ,
जैसे तुमने भर दी उनमें ,
हरसिंगारों जैसी काया,

बुधवार, 27 जुलाई 2011

जो तुम्हें मैं दूंद लाऊँ ,कुछ मुझे ऐसी खबर हो,
जो पता तेरा लगा दे ,जिन्दगी की वो खबर हो ,
चाँद -सूरज चल रहे हैं ,इस तरफ से उस तरफ तक ,
रोज ही वो आ रहे हैं, उस तरफ से इस तरफ तक,
क्यों नहीं मुझको बताते ,रोज इतना क्यों सताते ,
जिस तरह उनको तुम्हारी छेड़खानी की खबर हो,
कौन जीता है यहाँ पर , कौन मिटता है यहाँ पर ,
लुक छिपी का खेल यह क्यों , रोज चलता है यहाँ पर ,
किस महोब्बत से मिले थे ,किस महोब्बत से जिए थे ,
क्या पता इन बादलों को ,उस कहानी की खबर हो,
आज तुमने फिर मुझे कुछ प्यार से आकर सुलाया,
आँख से आँखें मिलाकर ,विश्व का दर्पण दिखाया,
दूरियों का सोचना क्या ,सिर्फ धोखा है यहाँ सब,
अंश तेरा बन गई हूँ उस निशानी की खबर हो,
आँखें कुछ कह तो सकती हैं ,देखें ना यह और बात है ,
,धुंधलाई है तस्वीर माना ,, अफ़साने की और बात है ,

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

जो तुम्हें मैं दूंद लाऊँ ,कुछ मुझे ऐसी खबर हो,
जो पता तेरा लगा दे ,जिन्दगी की वो खबर हो ,
चाँद -सूरज चल रहे हैं ,इस तरफ से उस तरफ तक ,
रोज ही वो आ रहे हैं, उस तरफ से इस तरफ तक,
क्यों नहीं मुझको बताते ,रोज इतना क्यों सताते ,
जिस तरह उनको तुम्हारी छेड़खानी की खबर हो,
कौन जीता है यहाँ पर , कौन मिटता है यहाँ पर ,
लुक छिपी का खेल यह क्यों , रोज चलता है यहाँ पर ,
किस महोब्बत से मिले थे ,किस महोब्बत से जिए थे ,
क्या पता इन बादलों को ,उस कहानी की खबर हो,
,

सोमवार, 25 जुलाई 2011

ख़ुशी छलकी जो आँखों से ,उसी के अश्रु झरते हैं,
अभी तक ज्वार -भाटे वो ,समंदर में उमड़ते हैं ,
अभी तक उन निगाहों में कहीं डूबा हुआ है दिल ,
अगर कुछ ख्वाव जिन्दा हैं, उन्हीं से बस गुजरते हैं,
सुबह जो भीग कर आई ,न सूखीं शाम तक पलकें,
घटाओं में घिरीं थीं जो ,तुमारी रेशमीं अलकें,
तुम्हें देखा , बहुत देखा ,सुबह से शाम तक देखा,
तुम्हारे ही उजालों में ,हमारे दिन निकलते हैं,
,सुबह जो भीग कर आई ,न सूखीं शाम तक पलकें,
घ टा ओं में घिरीं थीं जो ,तुमारी रेशमीं अलकें,
तुम्हें देखा ,बहुत देखा ,सुबह से शाम तक देखा ,
गिरी बूँदें टपककर जो ,
Raghvendra Awasthi ---aapke prem aur auralaulik sambandh ko dekh kar avibhoot hoon......aadhyatmik unchaaiyon tak bhi le jaati hain shringaar ke rath per bitha .....aapki panktiya aksar......Tushar ji waah....
सुबह जो भीग कर आई ,न सूखीं शाम तक पलकें,
घटाओं में घिरीं थीं जो ,तुमारी रेशमीं अलकें,
जो तुम्हें मैं दूंद लाऊँ ,कुछ मुझे ऐसी खबर हो,
जो पता तेरा लगा दे ,जिन्दगी की वो खबर हो ,
चाँद -सूरज चल रहे हैं ,इस तरफ से उस तरफ तक ,
रोज ही वो आ रहे हैं, उस तरफ से इस तरफ तक,
क्यों नहीं मुझको बताते ,रोज इतना क्यों सताते ,
जिस तरह उनको तुम्हारी छेड़खानी की खबर हो,
ख़ुशी छलकी जो आँखों से ,उसी के अश्रु झरते हैं,
अभी तक ज्वार -भाटे वो ,समंदर में उमड़ते हैं ,
अभी तक उन निगाहों में कहीं डूबा हुआ है दिल ,
अगर कुछ ख्वाव जिन्दा हैं, उन्हीं से बस गुजरते हैं,
ख़ुशी छलकी जो आँखों से ,उसी के अश्रु झरते हैं,
अभी तक ज्वार -भाटे वो ,समंदर में उमड़ते हैं ,
अभी तक उन निगाहों में कहीं डूबा हुआ है दिल ,
जहाँ डूबा अगर कोई

रविवार, 24 जुलाई 2011

ख़ुशी छलकी जो आँखों से ,उसी के अश्रु झरते हैं,
अभी तक ज्वार -भाटे वो ,समंदर में उमड़ते हैं ,

शनिवार, 23 जुलाई 2011

कभी सूरज निकलता है ,कभी बदली में छिपता है,
कभी कलियाँ चटखतीं है,कभी किरने उतरतीं हैं ,
कभी उनकी निगाहों में ,कभी अपनी निगाहों में .
बिछी जो ओस रहती है किसी ने दिल उतारा है .,

शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

कहीं पर झूमते पक्षी, कहीं पर झूमतीं शाखें ,
कहीं बादल झुके से हैं ,सुबह का यह नजारा है,
कभी वो गुनगुनाते हैं ,कभी वो चहचहाते हैं ,
हवाओं में मचलता -सा , तुम्हारा कुछ इशारा है ,

गुरुवार, 21 जुलाई 2011

शाम का सूरज दला है, बृक्ष गुमसुम से खड़े हैं,
पक्षियों के दल थके- से लौट कर वापस चले हैं ,
एक पूरा दिन गुजर कर , रह गया है इस तरह फिर,
जिन्दगी के स्वप्न जैसे शाख पर वापस चले हैं,
भोर के पंछी उड़े थे , भोर की पहली किरन तक,
साँझ के पंछी उड़े हैं , शाम की अंतिम किरन तक,
पंछियों की ये उड़ानें ,क्या संदेशा दे रहीं हैं,
जिन्दगी अभियान है इक ,जिन्दगी के अवतरण तक ,
एक पंछी जो कभी भी चैन से सोता नहीं है,
वो जहाँ की सब हदों को तोड़ देना चाहता है,
वो तुम्हारे वास्ते ही उड़ रहा है अनवरत -सा ,
वो सितारे सब गगन के तोड़ लेना चाहता है ,
कोई सुने न सुने ,बादल आबाज देते रहते हैं ,
वो जब भी बरसते हैं धरती की प्यास हर लेते हैं ,

बुधवार, 20 जुलाई 2011

एक पंछी जो कभी भी चैन से सोता नहीं है,
वो जहाँ की सब हदों को तोड़ देना चाहता है,
वो तुम्हारे वास्ते ही उड़ रहा है अनवरत -सा ,
वो सितारे सब गगन के तोड़ लेना चाहता है ,
भोर के पंछी उड़े थे , भोर की पहली किरन तक,
साँझ के पंछी उड़े हैं , शाम की अंतिम किरन तक,
पंछियों की ये उड़ानें ,क्या संदेशा दे रहीं हैं,
जिन्दगी अभियान है इक ,जिन्दगी के अवतरण तक ,

मंगलवार, 19 जुलाई 2011

शाम का सूरज दला है, बृक्ष गुमसुम से खड़े हैं,
पक्षियों के दल थके- से लौट कर वापस चले हैं ,
एक पूरा दिन गुजर कर ,इस तरह से रह गया फिर,
जिन्दगी के स्वप्न जैसे शाख पर वापस चले हैं,-

गुरुवार, 14 जुलाई 2011

इंसानियत को जख्म दे,हैवानियत चलने लगी ,
आदमी से आदमी की ही शख्शियत डरने लगी ,
आतंक से जीना यहाँ ,आतंक से मरना यहाँ ,
सभ्यता क्यों सभ्यता की आवारियत से मरने लगी ,
खामोशियों के बीच में ,जलजला -सा उठ रहा है,
क्या बतायें आपको हम, आज क्या-क्या उठ रहा है,
जिन्दगी हैरान है क्यों , जिन्दगी पर इस तरह अब ,
दर्दे-दिल इतना बता दे ,क्यों धुआं -सा उठ रहा है,

शनिवार, 9 जुलाई 2011

तुम जहाँ हो, मैं वहाँ हूँ,कौन समझेगा यहाँ पर,
बेबजह ही रो रहा हूँ, कौन समझेगा यहाँ पर,
द्र्श्य बिम्बित हो रहे हैं , सब तुम्हें साकार करने,
प्यार कितना है असीमित ,कौन समझेगा यहाँ पर,
कुछ अलौकिक बन्धनों -सी हैं तुम्हारी सुष्मितायें /
कुछ नहाई - सी प्रकृति है,कुछ नशीली -सी हवायें,
पंछियों की चहचहाहट ,भोर की हैं अर्चनायें,
सब तुम्हारी याद लेकर ,आ रहीं हैं, जा रहीं हैं,
कुछ तुम्हारा रूप लेकर ,गद रहीं हैं कल्पनायें ,

यह गुलाबी डालियाँ कुछ,कह रहीं हैं, सुन रहीं हैं,
कुछ मदिर -सी वासनायें ,तितलियों -सी उड़ रहीं हैं,
कुछ सुकोमल झील पर , बिखरी हुई है देह-राशि ,
पारदर्शी- भंगिमायें लोचनों में तिर रहीं हैं,
कुछ सुहानी धूप लेकर ,खिल रहीं हैं ज्योत्सनायें,

तुम जहाँ हो, मैं वहाँ हूँ,कौन समझेगा यहाँ पर,
बेबजह ही रो रहा हूँ, कौन समझेगा यहाँ पर,
द्र्श्य बिम्बित हो रहे हैं , सब तुम्हें साकार करने,
प्यार कितना है असीमित ,कौन समझेगा यहाँ पर,
कुछ अलौकिक बन्धनों -सी हैं तुम्हारी सुष्मितायें /
यह गुलाबी डालियाँ कुछ,कह रहीं हैं, सुन रहीं हैं,
कुछ मदिर -सी वासनायें ,तितलियों -सी उड़ रहीं हैं,
कुछ सुकोमल झील पर , बिखरी हुई है देह-राशि ,
पारदर्शी- भंगिमायें लोचनों में तिर रहीं हैं,
कुछ सुहानी धूप लेकर ,खिल रहीं हैं ज्योत्सनायें,

गुरुवार, 7 जुलाई 2011

कुछ धुआं -सा उठ रहा है,रौशनी के बीच में ,
चल रहा है कौन आखिर, पुतलियों के बीच में,
पार जाना है कहाँ तक ,कौन जाने, क्या पता ,
छा रहा है हर नजारा ,बदलियों के बीच में,

बुधवार, 6 जुलाई 2011

आँसू से भीगी चादर पर ,प्यार सिसकता है क्यों तेरा,
याद सिसकतीं हैं क्यों तेरी ,जिस्म फड़कता है क्यों तेरा,
तेरी खिड़की के बाहर क्यों ,इतना सन्नाटा पसरा है,
तुझे सुलाने वाली रातें ,पल-पल मुझसे पूछ रहीं हैं,
चाँद नहीं निकला है कबसे ,नींदें मुझसे पूछ रहीं हैं ,
तू जागा है या सोया है, नींदें मुझसे पूछ रहीं हैं,
तेरी धड़कन नहीं सुनाई देती है क्यों अब सीने मैं,
तू जिन्दा है किसकी खातिर करवट मुझसे पूछ रहीं हैं,

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

कल कोई ख्वाब आया था ,बेहिसाब आया था ,
पूरे जहाँ का हुस्न समेट कर ले आया था ,
आखिर नींद में भी हमारे कयामत आ गई ,
हमने तो एक शोला शबनम से बुझाया था /

सोमवार, 4 जुलाई 2011

हर तरफ आबाज तेरी,सुन रहा हूँ ,
हर तरफ झंकार तेरी सुन रहा हूँ,
इस धरा से ,आसमाँ तक ऐ महोब्बत ,
बारिशों के साज सारे सुन रहा हूँ,
रह न जाये कुछ अधूरा ,भीगता हूँ ,
रह न जाये कुछ जिगर में, चीखता हूँ ,
एक हलचल ,एक सिहरन , जिस्म में है,
होठ पर अपने दबाये घूमता हूँ,
क्या पता परवाज किसकी सुन रहा हूँ,
दर्द जिसमें भी छलकता ,दर्द तेरा ही छलकता,
ये फिजाओं को बताओ ,दर्द उनमें क्यों झलकता,
बात तुझसे हो रही है, ये फिजायें सुन रहीं हैं,
दर्दे - दिल मेरा बताओ , क्यों नहीं मुझसे संभालता,

गुरुवार, 30 जून 2011

चहचहाते पक्षियों ने ,भोर को आवाज दे दी,
झूमकर पूरी प्रकृति , चहचहाती जा रही है ,
वायु के कुछ मंद झोंके ,छू रहे हैं तन-बदन को,
हरितिमा में कौन आकर ,मुस्कुराती जा रही है,

बुधवार, 29 जून 2011

कौन कहता है यहाँ पर , हम नहीं हैं ,वो नहीं हैं,
सच कहें तो बस यहाँ पर ,और कुछ भी तो नहीं है,
चल रहा है सिलसिला यह ,रात- दिन इस जिन्दगी का ,
इस जहाँ का खेल देखो , वो कहीं पर,हम कहीं हैं,

रविवार, 26 जून 2011

इस जगत में सत्य क्या है,वो तुम्ही में बस छिपा है,
जन्म -म्रत्यु तो निमित हैं,दिलरुबा तुममें छिपा है,
झुरमुटों से क्यों निकलकर ,चाँद उगता है यहाँ पर,
बीच में कितनी झिरी है, यह द्रगों को ही पता है,
चांदनी में गम समेटे ,ये निशायें गह रही हैं ,
तुम बहुत ही पास में हो ,सुष्मितायें कह रही हैं/

शनिवार, 25 जून 2011

सुरमई - सी शाम दलकर, रोज वापस आ रही है,
पक्षियों की पांत उड़कर , बस यही समझा रही है,
प्रेम ,जन्मों का सफ़र है,फिर उदासी किसलिए ये ,
जिन्दगी तो बस उसी में ,रंग भरती जा रही है,
तुम मिलोगी सृष्टि रचकर ,भावनायें कह रहीं हैं /
खुशबुओं में तरबतर हो, ये हवायें बह रहीं हैं,
तुम यहीं हो ,पास में हो,हाल हमसे कह रहीं हैं/
दर्द ने चिठ्ठी लिखी है, क्या पता तुमने पदी हो,
धड़कनों की बेकरारी ,क्या पता तुमने सुनी हो,
किसतरह हम जी रहे हैं , किसतरह हम चल रहे हैं,
साँस में है जो प्रतीक्षा ,क्या पता तुमने बुनी हो,
हौसला तू मत डिगाना ,ये दिशाएँ कह रहीं हैं/

सोमवार, 20 जून 2011

हों न शायद ,इस जहाँ में,दर्द के चर्चे हमारे,
किन्तु आयेंगे उतरकर ,प्यार के मौसम हमारे,
गुनगुनायेंगी हवायें, बात पागल धड़कनों की,
कह रहे हो जो अभी तक , धड़कनों से तुम हमारे,
बेकसी की , हर कशिस तक, हम तुम्हारे हो रहे हैं/
हम तुम्ही को पा रहे हैं, हम तुम्हीं को खो रहे हैं ,
रात -दिन ये बेकरारी , बस तुम्हारे हो रहे हैं,
यज्ञ कोई चल रहा है इस जगत में ,उस जगत का ,
है नहीं कुछ भी हमारा,पर इशारे हो रहे हैं,
मन-विहग ये,उड़ रहा है जिस तरह से नील नभ में ,
दूंद ही लेगा तुम्हें ये ,बस हमें इतना पता है,
रोशनी जो आ रही है , झिलमिलाकर छा रही है,
चूम लेगा तन -बदन को ,बस हमें इतना पता है,
शिल्प , कुदरत के हजारों, बस तुम्हारे हो रहे हैं,
हों न शायद ,इस जहाँ में,दर्द के चर्चे हमारे,
किन्तु आयेंगे उतरकर ,प्यार के मौसम हमारे,
लोग छुपकर सुन रहे हैं बात सारी धड़कनों की,
कह रहे हो तुम अभी तक , धड़कनों से जो हमारे,
हर कशिस से, हर कशिस तक, हम तुम्हारे हो रहे हैं/

गुरुवार, 16 जून 2011

अंकुरित हो, पल्लवित हो, स्रष्टि रचना हो रही है,

रजकणों में आज कैसी ,हरहराहत हो रही है ,

कल खिलेंगे फूल इसमें ,यह छिपा सन्देश है,

धमनियों में एक सुरभित ,सनसनाहट हो रही है /

इस प्रकृति में चेतना है, प्रार्थना है,कल्पना है,

भोर का सूरज कहीं तो, पूर्णिमा का चंद्रमा है,

झील,झरने,मेघ ,सागर सब इसी में बह रहे हैं,

प्रेम का दरिया कहीं तो, प्रेयसी की भंगिमा है /

प्रस्फुटित -सी, उदघटित-सी,रूप- रचना हो रही है/

हो सके तो आज इसकी अर्चना के गीत गाओ,

आज इसके कुन्तलों में ,मधु -ऋतू अपनी मनाओ.

तन डुबाओ,मन डुबाओ,इक नई दुल्हन सजाओ,

इक नया श्रृंगार देकर ,बस इसे तुम जीत लाओ,

विस्फ़रित-सी,रस -द्रवित -सी, छन्द -रचना हो रही है/
आपका प्यार ही तो है, जो सीने से लगाये बैठे हैं,
नहीं तो हम यहाँ , यह जिन्दगी गंवाये बैठे हैं,
लोग समझ लेते हैं मजबूरियों को भी हमारी,.
हम बहुत मुश्किल से दरियादिली दिखाये बैठे हैं ,

रविवार, 12 जून 2011

करवटों पर अब महकती रात-रानी ही ख़तम है,
हैं घिरीं परछाईंयां जो,छत -दिवारों के तले अब,
नाचतीं हैं रात भर ये ,चाँद -तारों के तले अब,
कौन पूछेगा कभी अब,होठ की उन कोंपलों से,
प्यार कितना महजबीं है, यादगारों के तले अब,
हर निशानी अब खतम है, वो कहानी अब खतम है ,
रोज का मातम नहीं अब ,जिंदगानी ही खतम है,
लो तुम्हें आबाज देकर आखिरी में जा रहा हूँ ,
जो बसाई थी कभी वो राजधानी ही खतम है,
लौट आना ,किसलिए अब ,बुलबुलों से पूछ लेना ,
चाँदनी में झिलमिलाती चिलमनों से पूछ लेना ,
किस कदर होने लगीं थीं सनसनाहट तन -बदन में ,
हो सके तो इन गरजती, बिजलियों से पूछ लेना ,

शनिवार, 11 जून 2011

खामोशियों के बीच क्यों , जलजला- सा उठ रहा है,
क्या बतायें आपको हम ,आज क्या-क्या उठ रहा है,
जिन्दगी हैरान है बस , जिंदगी पर इस तरह,
तूफ़ान दर्दे- दिल बतादे , क्यों सुलगकर उठ रहा है,
थे यहाँ मौंसम हजारों खुशनुमा रंगीनियों के ,
जो तुम्हारे ही लिए थे गाज उनपर गिर गई है,
इस कदर धड़कन सिहरकर रह गयीं हैं अनमनी -सी,
उँगलियों पर चोट कोई ,साज की ही लग गयी है,

शुक्रवार, 10 जून 2011

जिन्दगी के हर सफे पर मौत के दसखत हुए हैं,
चाहता हूँ मौत पर भी ,जिन्दगी दसखत करे अब
प्यार में भीगी हुई वो हसरतें जिन्दा रहें सब,
खिल उठें ऐसी फिजायें , हर सुबह दसखत करे अब ,
दर्द से मेरी हिफाजत ,हो नहीं सकती कभी,
बिन तुम्हारे जिन्दगी ये ,जी नहीं सकती कभी,
मान लो इक प्यार का नगमा सुना था बस कभी,
गुनगुनाने से तस्सल्ली हो नहीं सकती कभी,

गुरुवार, 9 जून 2011

है बहुत आसान दिल के जख्म धोकर बह निकलना,
बंद पलकों में समाये रास्तों से हो गुजरना,
क्या पता हर बूँद में इक दर्द का बादल भरा हो,
हो सके तो आज मेरे घर जरा जमकर बरसना ,