शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

शुक्रवार, २९ जुलाई २०११

रेशा -रेशा इस जीवन का,

तुमसे निर्मित होकर आया ,

कोई किरन बची ना ऐसी ,

जिसने तुमको नहीं सजाया,

फूलों की मुस्कानों में तुम ,

अपनी खुशबू भर देती हो,

कोई झोंका बचा ना ऐसा ,

लिपट के तुमसे जो ना आया,

जितने मौसम बने यहाँ पर,

अंगड़ाई थी उनमें ऐसी ,

जैसे तुमने भर दी उनमें ,

हरसिंगारों जैसी काया,

छुई -मुई के पत्ते जैसे ,

सहसा स्पंदित होते हैं,

पलकों पर इंगित होती थी ,

सृष्टि की पूरी परिभाषा,

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