रविवार, 26 जून 2011

इस जगत में सत्य क्या है,वो तुम्ही में बस छिपा है,
जन्म -म्रत्यु तो निमित हैं,दिलरुबा तुममें छिपा है,
झुरमुटों से क्यों निकलकर ,चाँद उगता है यहाँ पर,
बीच में कितनी झिरी है, यह द्रगों को ही पता है,
चांदनी में गम समेटे ,ये निशायें गह रही हैं ,
तुम बहुत ही पास में हो ,सुष्मितायें कह रही हैं/

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