तेरी रचना शायद कर दूं ,शब्दों से तो हो न सकेगी,
इस मिट्टी में कितना दम है ,गुंथने से तो हो न सकेगी ,
जब तक तेरी साँसें मेरी ,साँसों में ही घुल जायेंगी,
किस साँचे में मन को रख दूं , दलने से तो हो न सकेगी ,
नदियों के जल में भी अक्सर, झिलमिल तेरी देखी मैंने ,
आँचल जैसी लहराती -सी , धूप - सुनहली देखी मैंने ,
पर्वत के उजले- शिखरों पर , जब भी तुझको महसूस किया ,
तेरे माथे की बिंदिया पर , सुबह- नवेली देखी मैंने,
शनिवार, 30 जुलाई 2011
शुक्रवार, 29 जुलाई 2011
रेशा -रेशा इस जीवन का,
तुमसे निर्मित होकर आया ,
कोई किरन बची ना ऐसी ,
जिसने तुमको नहीं सजाया /
फूलों की मुस्कानों में तुम ,
अपनी खुशबू भर देती हो,
कोई झोंका बचा ना ऐसा ,
निकट न तुमको जो ले आया /
जितने मौसम बने यहाँ पर,
अंगड़ाई थी उनमें ऐसी ,
जैसे तुममें रची-बसी थी ,
हरसिंगारों जैसी काया /
छुई -मुई के पत्ते जैसे ,
सहसा स्पंदित होते हैं,
पलकों पर इंगित होती थी ,
सृष्टि की पूरी प्रतिछाया /
....देवेन्द्र चौधरी ''तुषार''
,12-बी ,सेक्टर -3 ,
गौतम पल्ली मार्ग ,वैशाली, गाजियाबाद -201010
तुमसे निर्मित होकर आया ,
कोई किरन बची ना ऐसी ,
जिसने तुमको नहीं सजाया /
फूलों की मुस्कानों में तुम ,
अपनी खुशबू भर देती हो,
कोई झोंका बचा ना ऐसा ,
निकट न तुमको जो ले आया /
जितने मौसम बने यहाँ पर,
अंगड़ाई थी उनमें ऐसी ,
जैसे तुममें रची-बसी थी ,
हरसिंगारों जैसी काया /
छुई -मुई के पत्ते जैसे ,
सहसा स्पंदित होते हैं,
पलकों पर इंगित होती थी ,
सृष्टि की पूरी प्रतिछाया /
....देवेन्द्र चौधरी ''तुषार''
,12-बी ,सेक्टर -3 ,
गौतम पल्ली मार्ग ,वैशाली, गाजियाबाद -201010
शुक्रवार, २९ जुलाई २०११
रेशा -रेशा इस जीवन का,
तुमसे निर्मित होकर आया ,
कोई किरन बची ना ऐसी ,
जिसने तुमको नहीं सजाया,
फूलों की मुस्कानों में तुम ,
अपनी खुशबू भर देती हो,
कोई झोंका बचा ना ऐसा ,
लिपट के तुमसे जो ना आया,
जितने मौसम बने यहाँ पर,
अंगड़ाई थी उनमें ऐसी ,
जैसे तुमने भर दी उनमें ,
हरसिंगारों जैसी काया,
छुई -मुई के पत्ते जैसे ,
सहसा स्पंदित होते हैं,
पलकों पर इंगित होती थी ,
सृष्टि की पूरी परिभाषा,
रेशा -रेशा इस जीवन का,
तुमसे निर्मित होकर आया ,
कोई किरन बची ना ऐसी ,
जिसने तुमको नहीं सजाया,
फूलों की मुस्कानों में तुम ,
अपनी खुशबू भर देती हो,
कोई झोंका बचा ना ऐसा ,
लिपट के तुमसे जो ना आया,
जितने मौसम बने यहाँ पर,
अंगड़ाई थी उनमें ऐसी ,
जैसे तुमने भर दी उनमें ,
हरसिंगारों जैसी काया,
छुई -मुई के पत्ते जैसे ,
सहसा स्पंदित होते हैं,
पलकों पर इंगित होती थी ,
सृष्टि की पूरी परिभाषा,
रेशा -रेशा इस जीवन का,
तुमसे निर्मित होकर आया ,
कोई किरन बची ना ऐसी ,
जिसने तुमको नहीं सजाया,
फूलों की मुस्कानों में तुम ,
अपनी खुशबू भर देती हो,
कोई झोंका बचा ना ऐसा ,
लिपट के तुमसे जो ना आया,
जितने मौसम बने यहाँ पर,
अंगड़ाई थी उनमें ऐसी ,
जैसे तुमने भर दी उनमें ,
हरसिंगारों जैसी काया,
छुई -मुई के पत्तों पर जैसे ,
स्पंदन सहसा हो जाते ,
पलकों पर नाचा करती थी ,
सृष्टि की पूरी परिभाषा,
तुमसे निर्मित होकर आया ,
कोई किरन बची ना ऐसी ,
जिसने तुमको नहीं सजाया,
फूलों की मुस्कानों में तुम ,
अपनी खुशबू भर देती हो,
कोई झोंका बचा ना ऐसा ,
लिपट के तुमसे जो ना आया,
जितने मौसम बने यहाँ पर,
अंगड़ाई थी उनमें ऐसी ,
जैसे तुमने भर दी उनमें ,
हरसिंगारों जैसी काया,
छुई -मुई के पत्तों पर जैसे ,
स्पंदन सहसा हो जाते ,
पलकों पर नाचा करती थी ,
सृष्टि की पूरी परिभाषा,
गुरुवार, 28 जुलाई 2011
बुधवार, 27 जुलाई 2011
जो तुम्हें मैं दूंद लाऊँ ,कुछ मुझे ऐसी खबर हो,
जो पता तेरा लगा दे ,जिन्दगी की वो खबर हो ,
चाँद -सूरज चल रहे हैं ,इस तरफ से उस तरफ तक ,
रोज ही वो आ रहे हैं, उस तरफ से इस तरफ तक,
क्यों नहीं मुझको बताते ,रोज इतना क्यों सताते ,
जिस तरह उनको तुम्हारी छेड़खानी की खबर हो,
कौन जीता है यहाँ पर , कौन मिटता है यहाँ पर ,
लुक छिपी का खेल यह क्यों , रोज चलता है यहाँ पर ,
किस महोब्बत से मिले थे ,किस महोब्बत से जिए थे ,
क्या पता इन बादलों को ,उस कहानी की खबर हो,
आज तुमने फिर मुझे कुछ प्यार से आकर सुलाया,
आँख से आँखें मिलाकर ,विश्व का दर्पण दिखाया,
दूरियों का सोचना क्या ,सिर्फ धोखा है यहाँ सब,
अंश तेरा बन गई हूँ उस निशानी की खबर हो,
जो पता तेरा लगा दे ,जिन्दगी की वो खबर हो ,
चाँद -सूरज चल रहे हैं ,इस तरफ से उस तरफ तक ,
रोज ही वो आ रहे हैं, उस तरफ से इस तरफ तक,
क्यों नहीं मुझको बताते ,रोज इतना क्यों सताते ,
जिस तरह उनको तुम्हारी छेड़खानी की खबर हो,
कौन जीता है यहाँ पर , कौन मिटता है यहाँ पर ,
लुक छिपी का खेल यह क्यों , रोज चलता है यहाँ पर ,
किस महोब्बत से मिले थे ,किस महोब्बत से जिए थे ,
क्या पता इन बादलों को ,उस कहानी की खबर हो,
आज तुमने फिर मुझे कुछ प्यार से आकर सुलाया,
आँख से आँखें मिलाकर ,विश्व का दर्पण दिखाया,
दूरियों का सोचना क्या ,सिर्फ धोखा है यहाँ सब,
अंश तेरा बन गई हूँ उस निशानी की खबर हो,
मंगलवार, 26 जुलाई 2011
जो तुम्हें मैं दूंद लाऊँ ,कुछ मुझे ऐसी खबर हो,
जो पता तेरा लगा दे ,जिन्दगी की वो खबर हो ,
चाँद -सूरज चल रहे हैं ,इस तरफ से उस तरफ तक ,
रोज ही वो आ रहे हैं, उस तरफ से इस तरफ तक,
क्यों नहीं मुझको बताते ,रोज इतना क्यों सताते ,
जिस तरह उनको तुम्हारी छेड़खानी की खबर हो,
कौन जीता है यहाँ पर , कौन मिटता है यहाँ पर ,
लुक छिपी का खेल यह क्यों , रोज चलता है यहाँ पर ,
किस महोब्बत से मिले थे ,किस महोब्बत से जिए थे ,
क्या पता इन बादलों को ,उस कहानी की खबर हो,
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जो पता तेरा लगा दे ,जिन्दगी की वो खबर हो ,
चाँद -सूरज चल रहे हैं ,इस तरफ से उस तरफ तक ,
रोज ही वो आ रहे हैं, उस तरफ से इस तरफ तक,
क्यों नहीं मुझको बताते ,रोज इतना क्यों सताते ,
जिस तरह उनको तुम्हारी छेड़खानी की खबर हो,
कौन जीता है यहाँ पर , कौन मिटता है यहाँ पर ,
लुक छिपी का खेल यह क्यों , रोज चलता है यहाँ पर ,
किस महोब्बत से मिले थे ,किस महोब्बत से जिए थे ,
क्या पता इन बादलों को ,उस कहानी की खबर हो,
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सोमवार, 25 जुलाई 2011
ख़ुशी छलकी जो आँखों से ,उसी के अश्रु झरते हैं,
अभी तक ज्वार -भाटे वो ,समंदर में उमड़ते हैं ,
अभी तक उन निगाहों में कहीं डूबा हुआ है दिल ,
अगर कुछ ख्वाव जिन्दा हैं, उन्हीं से बस गुजरते हैं,
सुबह जो भीग कर आई ,न सूखीं शाम तक पलकें,
घटाओं में घिरीं थीं जो ,तुमारी रेशमीं अलकें,
तुम्हें देखा , बहुत देखा ,सुबह से शाम तक देखा,
तुम्हारे ही उजालों में ,हमारे दिन निकलते हैं,
अभी तक ज्वार -भाटे वो ,समंदर में उमड़ते हैं ,
अभी तक उन निगाहों में कहीं डूबा हुआ है दिल ,
अगर कुछ ख्वाव जिन्दा हैं, उन्हीं से बस गुजरते हैं,
सुबह जो भीग कर आई ,न सूखीं शाम तक पलकें,
घटाओं में घिरीं थीं जो ,तुमारी रेशमीं अलकें,
तुम्हें देखा , बहुत देखा ,सुबह से शाम तक देखा,
तुम्हारे ही उजालों में ,हमारे दिन निकलते हैं,
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