अंकुरित हो, पल्लवित हो, स्रष्टि रचना हो रही है,
रजकणों में आज कैसी ,हरहराहत हो रही है ,
कल खिलेंगे फूल इसमें ,यह छिपा सन्देश है,
धमनियों में एक सुरभित ,सनसनाहट हो रही है /
इस प्रकृति में चेतना है, प्रार्थना है,कल्पना है,
भोर का सूरज कहीं तो, पूर्णिमा का चंद्रमा है,
झील,झरने,मेघ ,सागर सब इसी में बह रहे हैं,
प्रेम का दरिया कहीं तो, प्रेयसी की भंगिमा है /
प्रस्फुटित -सी, उदघटित-सी,रूप- रचना हो रही है/
हो सके तो आज इसकी अर्चना के गीत गाओ,
आज इसके कुन्तलों में ,मधु -ऋतू अपनी मनाओ.
तन डुबाओ,मन डुबाओ,इक नई दुल्हन सजाओ,
इक नया श्रृंगार देकर ,बस इसे तुम जीत लाओ,
विस्फ़रित-सी,रस -द्रवित -सी, छन्द -रचना हो रही है/
गुरुवार, 16 जून 2011
रविवार, 12 जून 2011
हर निशानी अब खतम है, वो कहानी अब खतम है ,
रोज का मातम नहीं अब ,जिंदगानी ही खतम है,
लो तुम्हें आबाज देकर आखिरी में जा रहा हूँ ,
जो बसाई थी कभी वो राजधानी ही खतम है,
लौट आना ,किसलिए अब ,बुलबुलों से पूछ लेना ,
चाँदनी में झिलमिलाती चिलमनों से पूछ लेना ,
किस कदर होने लगीं थीं सनसनाहट तन -बदन में ,
हो सके तो इन गरजती, बिजलियों से पूछ लेना ,
रोज का मातम नहीं अब ,जिंदगानी ही खतम है,
लो तुम्हें आबाज देकर आखिरी में जा रहा हूँ ,
जो बसाई थी कभी वो राजधानी ही खतम है,
लौट आना ,किसलिए अब ,बुलबुलों से पूछ लेना ,
चाँदनी में झिलमिलाती चिलमनों से पूछ लेना ,
किस कदर होने लगीं थीं सनसनाहट तन -बदन में ,
हो सके तो इन गरजती, बिजलियों से पूछ लेना ,
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