शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

रेशा -रेशा इस जीवन का,

तुमसे निर्मित होकर आया ,

कोई किरन बची ना ऐसी ,

जिसने तुमको नहीं सजाया /

फूलों की मुस्कानों में तुम ,

अपनी खुशबू भर देती हो,

कोई झोंका बचा ना ऐसा ,

निकट न तुमको जो ले आया /

जितने मौसम बने यहाँ पर,

अंगड़ाई थी उनमें ऐसी ,

जैसे तुममें रची-बसी थी ,

हरसिंगारों जैसी काया /

छुई -मुई के पत्ते जैसे ,

सहसा स्पंदित होते हैं,

पलकों पर इंगित होती थी ,

सृष्टि की पूरी प्रतिछाया /

....देवेन्द्र चौधरी ''तुषार''

,12-बी ,सेक्टर -3 ,

गौतम पल्ली मार्ग ,वैशाली, गाजियाबाद -201010

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