रेशा -रेशा इस जीवन का,
तुमसे निर्मित होकर आया ,
कोई किरन बची ना ऐसी ,
जिसने तुमको नहीं सजाया /
फूलों की मुस्कानों में तुम ,
अपनी खुशबू भर देती हो,
कोई झोंका बचा ना ऐसा ,
निकट न तुमको जो ले आया /
जितने मौसम बने यहाँ पर,
अंगड़ाई थी उनमें ऐसी ,
जैसे तुममें रची-बसी थी ,
हरसिंगारों जैसी काया /
छुई -मुई के पत्ते जैसे ,
सहसा स्पंदित होते हैं,
पलकों पर इंगित होती थी ,
सृष्टि की पूरी प्रतिछाया /
....देवेन्द्र चौधरी ''तुषार''
,12-बी ,सेक्टर -3 ,
गौतम पल्ली मार्ग ,वैशाली, गाजियाबाद -201010
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