किताब कोई दर्द की खुल गई है आहिस्ता ,
कुछ सफों पर जम गई है बे जुबानी आहिस्ता ,
अश्क से पूछा किसी ने क्यों टपकता है यहाँ,
लिख रहा क्यों सूखकर तू ये कहानी आहिस्ता,
हस्तियाँ मिटने लगीं हैं देख ले तू आहिस्ता ,
फूल सब मुरझा रहे हैं देख ले तू आहिस्ता ,
छोड़ दे , दो शब्द अपने हो सके तो प्यार के,
पास तेरे क्या बचा है देख ले तू आहिस्ता ,
सिर्फ तेरे पास तेरी जिद खड़ी है आहिस्ता ,
बोझ तेरा कम नहीं है सह रहा तू आहिस्ता ,
बाँट ले तू मुस्कुराकर जिन्दगी को आहिस्ता,
लोग तेरी हमदिली पर मिट गये हैं आहिस्ता,
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