शनिवार, 9 जुलाई 2011

कुछ नहाई - सी प्रकृति है,कुछ नशीली -सी हवायें,
पंछियों की चहचहाहट ,भोर की हैं अर्चनायें,
सब तुम्हारी याद लेकर ,आ रहीं हैं, जा रहीं हैं,
कुछ तुम्हारा रूप लेकर ,गद रहीं हैं कल्पनायें ,

यह गुलाबी डालियाँ कुछ,कह रहीं हैं, सुन रहीं हैं,
कुछ मदिर -सी वासनायें ,तितलियों -सी उड़ रहीं हैं,
कुछ सुकोमल झील पर , बिखरी हुई है देह-राशि ,
पारदर्शी- भंगिमायें लोचनों में तिर रहीं हैं,
कुछ सुहानी धूप लेकर ,खिल रहीं हैं ज्योत्सनायें,

तुम जहाँ हो, मैं वहाँ हूँ,कौन समझेगा यहाँ पर,
बेबजह ही रो रहा हूँ, कौन समझेगा यहाँ पर,
द्र्श्य बिम्बित हो रहे हैं , सब तुम्हें साकार करने,
प्यार कितना है असीमित ,कौन समझेगा यहाँ पर,
कुछ अलौकिक बन्धनों -सी हैं तुम्हारी सुष्मितायें /

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