इंसानियत को जख्म दे,हैवानियत चलने लगी , आदमी से आदमी की ही शख्शियत डरने लगी , आतंक से जीना यहाँ ,आतंक से मरना यहाँ , सभ्यता क्यों सभ्यता की आवारियत से मरने लगी ,
खामोशियों के बीच में ,जलजला -सा उठ रहा है, क्या बतायें आपको हम, आज क्या-क्या उठ रहा है, जिन्दगी हैरान है क्यों , जिन्दगी पर इस तरह अब , दर्दे-दिल इतना बता दे ,क्यों धुआं -सा उठ रहा है,