शनिवार, 9 जुलाई 2011

तुम जहाँ हो, मैं वहाँ हूँ,कौन समझेगा यहाँ पर,
बेबजह ही रो रहा हूँ, कौन समझेगा यहाँ पर,
द्र्श्य बिम्बित हो रहे हैं , सब तुम्हें साकार करने,
प्यार कितना है असीमित ,कौन समझेगा यहाँ पर,
कुछ अलौकिक बन्धनों -सी हैं तुम्हारी सुष्मितायें /
कुछ नहाई - सी प्रकृति है,कुछ नशीली -सी हवायें,
पंछियों की चहचहाहट ,भोर की हैं अर्चनायें,
सब तुम्हारी याद लेकर ,आ रहीं हैं, जा रहीं हैं,
कुछ तुम्हारा रूप लेकर ,गद रहीं हैं कल्पनायें ,

यह गुलाबी डालियाँ कुछ,कह रहीं हैं, सुन रहीं हैं,
कुछ मदिर -सी वासनायें ,तितलियों -सी उड़ रहीं हैं,
कुछ सुकोमल झील पर , बिखरी हुई है देह-राशि ,
पारदर्शी- भंगिमायें लोचनों में तिर रहीं हैं,
कुछ सुहानी धूप लेकर ,खिल रहीं हैं ज्योत्सनायें,

तुम जहाँ हो, मैं वहाँ हूँ,कौन समझेगा यहाँ पर,
बेबजह ही रो रहा हूँ, कौन समझेगा यहाँ पर,
द्र्श्य बिम्बित हो रहे हैं , सब तुम्हें साकार करने,
प्यार कितना है असीमित ,कौन समझेगा यहाँ पर,
कुछ अलौकिक बन्धनों -सी हैं तुम्हारी सुष्मितायें /
यह गुलाबी डालियाँ कुछ,कह रहीं हैं, सुन रहीं हैं,
कुछ मदिर -सी वासनायें ,तितलियों -सी उड़ रहीं हैं,
कुछ सुकोमल झील पर , बिखरी हुई है देह-राशि ,
पारदर्शी- भंगिमायें लोचनों में तिर रहीं हैं,
कुछ सुहानी धूप लेकर ,खिल रहीं हैं ज्योत्सनायें,

गुरुवार, 7 जुलाई 2011

कुछ धुआं -सा उठ रहा है,रौशनी के बीच में ,
चल रहा है कौन आखिर, पुतलियों के बीच में,
पार जाना है कहाँ तक ,कौन जाने, क्या पता ,
छा रहा है हर नजारा ,बदलियों के बीच में,

बुधवार, 6 जुलाई 2011

आँसू से भीगी चादर पर ,प्यार सिसकता है क्यों तेरा,
याद सिसकतीं हैं क्यों तेरी ,जिस्म फड़कता है क्यों तेरा,
तेरी खिड़की के बाहर क्यों ,इतना सन्नाटा पसरा है,
तुझे सुलाने वाली रातें ,पल-पल मुझसे पूछ रहीं हैं,
चाँद नहीं निकला है कबसे ,नींदें मुझसे पूछ रहीं हैं ,
तू जागा है या सोया है, नींदें मुझसे पूछ रहीं हैं,
तेरी धड़कन नहीं सुनाई देती है क्यों अब सीने मैं,
तू जिन्दा है किसकी खातिर करवट मुझसे पूछ रहीं हैं,

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

कल कोई ख्वाब आया था ,बेहिसाब आया था ,
पूरे जहाँ का हुस्न समेट कर ले आया था ,
आखिर नींद में भी हमारे कयामत आ गई ,
हमने तो एक शोला शबनम से बुझाया था /

सोमवार, 4 जुलाई 2011

हर तरफ आबाज तेरी,सुन रहा हूँ ,
हर तरफ झंकार तेरी सुन रहा हूँ,
इस धरा से ,आसमाँ तक ऐ महोब्बत ,
बारिशों के साज सारे सुन रहा हूँ,
रह न जाये कुछ अधूरा ,भीगता हूँ ,
रह न जाये कुछ जिगर में, चीखता हूँ ,
एक हलचल ,एक सिहरन , जिस्म में है,
होठ पर अपने दबाये घूमता हूँ,
क्या पता परवाज किसकी सुन रहा हूँ,
दर्द जिसमें भी छलकता ,दर्द तेरा ही छलकता,
ये फिजाओं को बताओ ,दर्द उनमें क्यों झलकता,
बात तुझसे हो रही है, ये फिजायें सुन रहीं हैं,
दर्दे - दिल मेरा बताओ , क्यों नहीं मुझसे संभालता,