गुरुवार, 30 जून 2011

चहचहाते पक्षियों ने ,भोर को आवाज दे दी,
झूमकर पूरी प्रकृति , चहचहाती जा रही है ,
वायु के कुछ मंद झोंके ,छू रहे हैं तन-बदन को,
हरितिमा में कौन आकर ,मुस्कुराती जा रही है,

बुधवार, 29 जून 2011

कौन कहता है यहाँ पर , हम नहीं हैं ,वो नहीं हैं,
सच कहें तो बस यहाँ पर ,और कुछ भी तो नहीं है,
चल रहा है सिलसिला यह ,रात- दिन इस जिन्दगी का ,
इस जहाँ का खेल देखो , वो कहीं पर,हम कहीं हैं,

रविवार, 26 जून 2011

इस जगत में सत्य क्या है,वो तुम्ही में बस छिपा है,
जन्म -म्रत्यु तो निमित हैं,दिलरुबा तुममें छिपा है,
झुरमुटों से क्यों निकलकर ,चाँद उगता है यहाँ पर,
बीच में कितनी झिरी है, यह द्रगों को ही पता है,
चांदनी में गम समेटे ,ये निशायें गह रही हैं ,
तुम बहुत ही पास में हो ,सुष्मितायें कह रही हैं/