एक पंखरी फूल की , होठ पर ऐसी लगी ,
छुट नहीं पायी कभी , होठ खिलते रह गए ,
अश्रु उसको सींचकर ओस जैसे गिर गए,
ख्वाब जो झिलमिल हुए , रश्मियों से भर गए ,
शनिवार, 6 अगस्त 2011
बुधवार, 3 अगस्त 2011
मंगलवार, 2 अगस्त 2011
सोमवार, 1 अगस्त 2011
तेरी रचना शायद कर दूं ,शब्दों से तो हो न सकेगी,
इस मिट्टी में कितना दम है ,गुंथने से तो हो न सकेगी ,
जब तक तेरी साँसें मेरी ,साँसों में ही घुल जायेंगी,
किस साँचे में मन को रख दूं , दलने से तो हो न सकेगी ,
नदियों के जल में भी अक्सर, झिलमिल तेरी देखी मैंने ,
आँचल जैसी लहराती -सी , धूप - सुनहली देखी मैंने ,
पर्वत के उजले- शिखरों पर , जब भी तुझको महसूस किया ,
तेरे माथे की बिंदिया पर , सुबह- नवेली देखी मैंने,
मेरे पास बचे हैं तेरी यादों के वो मौसम सारे ,
एक - एक कर गुजर रहे हैं पलकों में वो घुले नज़ारे,
तू आती है , तू जाती है ,उत्सव जैसे आते -जाते ,
किसे पता है तुझसे होते कितने मेरे मदिर इशारे ,
इस मिट्टी में कितना दम है ,गुंथने से तो हो न सकेगी ,
जब तक तेरी साँसें मेरी ,साँसों में ही घुल जायेंगी,
किस साँचे में मन को रख दूं , दलने से तो हो न सकेगी ,
नदियों के जल में भी अक्सर, झिलमिल तेरी देखी मैंने ,
आँचल जैसी लहराती -सी , धूप - सुनहली देखी मैंने ,
पर्वत के उजले- शिखरों पर , जब भी तुझको महसूस किया ,
तेरे माथे की बिंदिया पर , सुबह- नवेली देखी मैंने,
मेरे पास बचे हैं तेरी यादों के वो मौसम सारे ,
एक - एक कर गुजर रहे हैं पलकों में वो घुले नज़ारे,
तू आती है , तू जाती है ,उत्सव जैसे आते -जाते ,
किसे पता है तुझसे होते कितने मेरे मदिर इशारे ,
रविवार, 31 जुलाई 2011
किताब कोई दर्द की खुल गई है आहिस्ता ,
कुछ सफों पर जम गई है बे जुबानी आहिस्ता ,
अश्क से पूछा किसी ने क्यों टपकता है यहाँ,
लिख रहा क्यों सूखकर तू ये कहानी आहिस्ता,
हस्तियाँ मिटने लगीं हैं देख ले तू आहिस्ता ,
फूल सब मुरझा रहे हैं देख ले तू आहिस्ता ,
छोड़ दे , दो शब्द अपने हो सके तो प्यार के,
पास तेरे क्या बचा है देख ले तू आहिस्ता ,
सिर्फ तेरे पास तेरी जिद खड़ी है आहिस्ता ,
बोझ तेरा कम नहीं है सह रहा तू आहिस्ता ,
बाँट ले तू मुस्कुराकर जिन्दगी को आहिस्ता,
लोग तेरी हमदिली पर मिट गये हैं आहिस्ता,
कुछ सफों पर जम गई है बे जुबानी आहिस्ता ,
अश्क से पूछा किसी ने क्यों टपकता है यहाँ,
लिख रहा क्यों सूखकर तू ये कहानी आहिस्ता,
हस्तियाँ मिटने लगीं हैं देख ले तू आहिस्ता ,
फूल सब मुरझा रहे हैं देख ले तू आहिस्ता ,
छोड़ दे , दो शब्द अपने हो सके तो प्यार के,
पास तेरे क्या बचा है देख ले तू आहिस्ता ,
सिर्फ तेरे पास तेरी जिद खड़ी है आहिस्ता ,
बोझ तेरा कम नहीं है सह रहा तू आहिस्ता ,
बाँट ले तू मुस्कुराकर जिन्दगी को आहिस्ता,
लोग तेरी हमदिली पर मिट गये हैं आहिस्ता,
तेरी रचना शायद कर दूं ,शब्दों से तो हो न सकेगी,
इस मिट्टी में कितना दम है ,गुंथने से तो हो न सकेगी ,
जब तक तेरी साँसें मेरी ,साँसों में ही घुल जायेंगी,
किस साँचे में मन को रख दूं , दलने से तो हो न सकेगी ,
नदियों के जल में भी अक्सर, झिलमिल तेरी देखी मैंने ,
आँचल जैसी लहराती -सी , धूप - सुनहली देखी मैंने ,
पर्वत के उजले- शिखरों पर , जब भी तुझको महसूस किया ,
तेरे माथे की बिंदिया पर , सुबह- नवेली देखी मैंने,
मेरे पास बचे हैं तेरी यादों के वो मौसम सारे ,
एक - एक कर गुजर रहे हैं पलकों में वो घुले नज़ारे,
तू आती है , तू जाती है ,उत्सव जैसे आते -जाते ,
किसे पता है तुझसे होते कितने मेरे इशारे
इस मिट्टी में कितना दम है ,गुंथने से तो हो न सकेगी ,
जब तक तेरी साँसें मेरी ,साँसों में ही घुल जायेंगी,
किस साँचे में मन को रख दूं , दलने से तो हो न सकेगी ,
नदियों के जल में भी अक्सर, झिलमिल तेरी देखी मैंने ,
आँचल जैसी लहराती -सी , धूप - सुनहली देखी मैंने ,
पर्वत के उजले- शिखरों पर , जब भी तुझको महसूस किया ,
तेरे माथे की बिंदिया पर , सुबह- नवेली देखी मैंने,
मेरे पास बचे हैं तेरी यादों के वो मौसम सारे ,
एक - एक कर गुजर रहे हैं पलकों में वो घुले नज़ारे,
तू आती है , तू जाती है ,उत्सव जैसे आते -जाते ,
किसे पता है तुझसे होते कितने मेरे इशारे
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