गुरुवार, 11 अगस्त 2011

कुछ पत्तों के पीछे अक्सर, चाँद छिपा मैंने देखा है,
मेरी खिड़की से जब गुजरा, नजरों में उसको देखा है ,
मुग्ध लगा था वो कितना अपनी मदहोशी के आलम में ,
अधरों की कितनी किरचों ने छू छू कर उसको देखा है ,

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