शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

नहीं संभलते आँसू मुझसे ,मैंने बहना सीख लिया है ,
तेरा ही तो गम है मितवा ,मैंने पीना सीख लिया है,
मैं क्या पिघला पर्वत पिघले ,आँखों से ये झरने निकले,
तेरी उल्फत का दरिया है ,इसमें तेरे सागर निकले ,
खारी बूँदों को पी -पी कर , मैंने जीना सीख लिया है /

गुरुवार, 11 अगस्त 2011

कुछ पत्तों के पीछे अक्सर, चाँद छिपा मैंने देखा है,
मेरी खिड़की से जब गुजरा, नजरों में उसको देखा है ,
मुग्ध लगा था वो कितना अपनी मदहोशी के आलम में ,
अधरों की कितनी किरचों ने छू छू कर उसको देखा है ,
कुछ पत्तों के पीछे अक्सर, चाँद छिपा मैंने देखा है,
मेरी खिड़की से जब गुजरा, नजरों में उसको देखा है ,

बुधवार, 10 अगस्त 2011

अलसाते फूलों का खिलना ,पलकों में बंद पड़ा है ,
कैसे खोलूँ यह आँखें ,उनमें क्या - क्या बंद पड़ा है,
रेशम -सी काया है कोई ,सिहरन बनकर छाई है ,
जाने कितने उन्मादों की, तितली उड़कर आई है ,
अवचेतन में जैसे इठलाता मधुवन बंद पड़ा है ,

मंगलवार, 9 अगस्त 2011

अलसाते फूलों का खिलना ,पलकों में बंद पड़ा है ,
कैसे खोलूँ यह आँखें ,उनमें क्या - क्या बंद पड़ा है,
रेशम -सी काया है कोई ,सिहरन बनकर छाई है ,
जाने कितने उन्मादों की, तितली उड़कर आई है ,